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अगर...
अगर तुम उस समय भी शांत रह सको
जब तुम्हारे विरुद्ध सबसे ऊँची आवाज़ें उठ रही हों,
और तुम्हें अपनी सफ़ाई देने से अधिक
अपने सत्य पर भरोसा हो।
अगर तुम लोगों की राय सुन सको,
पर अपना विवेक गिरवी न रखो,
और भीड़ के शोर में भी
अपने भीतर की धीमी आवाज़ पहचान लो।
अगर तुम हारने के बाद
परिणाम से नहीं,
अपने प्रयास से प्रश्न कर सको,
और जीतने के बाद भी
अपने अभिमान पर पहरा रख सको।
अगर तुम प्रतीक्षा कर सको
बिना शिकायत के,
और प्रेम कर सको
बिना स्वामित्व के,
और विदा कर सको
बिना कटुता के।
अगर तुम यह स्वीकार कर सको
कि हर सत्य तुम्हारे पक्ष में नहीं होगा,
और हर असहमति तुम्हारा अपमान नहीं होती।
अगर तुम अपने सपनों को इतना बड़ा रखो
कि वे तुम्हें दिशा दें,
पर इतना बड़ा नहीं
कि वे तुम्हें मनुष्य होना भुला दें।
अगर तुम टूटे हुए विश्वास के बाद भी
विश्वास करना सीख सको,
और अपमान के बाद भी
अपनी कोमलता बचाए रख सको।
अगर तुम यह समझ सको
कि कुछ लोग तुम्हें कभी नहीं समझेंगे,
और फिर भी तुम्हारे भीतर
उनके लिए घृणा जन्म न ले।
अगर तुम उस दिन भी
किसी और के लिए प्रकाश बचाकर रखो,
जिस दिन तुम्हारे भीतर स्वयं अँधेरा हो,
तो समझना—
तुम सफल नहीं,
उससे कहीं अधिक दुर्लभ चीज़ बन रहे हो।
तुम मनुष्य बन रहे हो।
🪶 𝐊𝐨𝐦𝐚𝐥 𝐑𝐚𝐣𝐩𝐮𝐭Читать полностью…
साहित्यिक लेखिका ✍️🌸
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कुछ बातों की बात ही कुछ और है
पुरानी किताबों में रखे हुए
सूखे फूल की बात ही कुछ और है,
वर्षों बाद मिले किसी पत्र पर
ठहरे हुए अक्षरों की बात ही कुछ और है।
कभी देखना
साँझ उतरते समय किसी नदी को,
लगेगा जैसे
दिन भर का शोर छोड़कर
जल भी ध्यान में बैठ गया हो।
जाने कितने मौसमों की थकान लिए
चलती रहती है एक पगडंडी,
कभी गाँव की ओर,
कभी स्मृतियों की ओर,
और कभी स्वयं मनुष्य के भीतर।
कुछ चेहरे भी ऐसे होते हैं,
न बहुत सुंदर,
न बहुत असाधारण,
फिर भी बरसों बाद
याद सबसे पहले वही आते हैं।
सच ही तो है,
कुछ नदियाँ,
कुछ रास्ते,
कुछ पेड़,
कुछ चुप्पियाँ,
कुछ लोग,
अपने होने से अधिक
अपने रह जाने के कारण प्रिय लगते हैं।
और शायद...
प्रेम भी वही नहीं होता
जो सबसे अधिक कहा जाए,
प्रेम तो वह होता है
जो वर्षों बाद भी
मन के किसी कोने में
वैसा ही ताज़ा मिले
जैसे पहली बार मिला था।
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दुनिया में सबसे सस्ती चीज़ सलाह है,
और सबसे महँगी चीज़ वह गलती,
जिसे करने के बाद सलाह समझ आती है।
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मनुष्य की असली तस्वीर आईने में नहीं दिखती,
वह उन वाक्यों में दिखती है
जो वह आपकी अनुपस्थिति में आपके लिए चुनता है।
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मीडिया के लिए वह एक आँकड़ा था,
किसी घर के लिए वह पूरी वर्णमाला था।"
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सुरज में आग है, चांद में दाग़ है,
और भाई - बहन में अप्रतिम प्यार है ...
Happy Raksha Bandhan
Good Morning All
मेरी राखी की डोर में भाई का प्यार है,
भाभी के रूप में मिला एक और परिवार है।
ईश्वर रखे दोनों को हमेशा खुशहाल,
यही मेरे दिल की सबसे प्यारी पुकार है। 💕
💐हैप्पी रक्षाबंधन भाई-भाभी💐
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यदि बहू किसी की बेटी है,
तो फिर घर बदलते ही
उसके अधिकारों का पता क्यों बदल जाता है?
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समाज की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि—
वह सत्य से पहले व्यक्ति का परिचय पूछता है।
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अभी शेष है
जो चला गया है, उसे अन्त मत समझो।
बहुत बार जीवन विराम के वस्त्र पहनकर आता है, और हम उसे पूर्णविराम समझ बैठते हैं।
तुम्हें लगता है सब कुछ यहीं समाप्त हो गया,
पर समय की जेब में अब भी कई अनखुले दिवस पड़े हैं।
अभी कई दृश्य शेष हैं, कई संवाद अनकहे हैं, कई पात्रों ने अभी रंगमंच पर प्रवेश ही नहीं किया।
यह जो अन्धकार है, यह सूर्य का विरोध नहीं, उसकी प्रस्तावना भी हो सकता है।
यह जो टूटन है, संभव है इसी में किसी नये आकार का बीज रखा हो।
कौन जानता है—
कल किसी भूली हुई गली में तुम्हें अपना ही कोई खोया हुआ स्वर मिल जाए,
किसी साधारण-सी भेंट में वर्षों से लापता प्रसन्नता मिल जाए,
या किसी अनजान मनुष्य की एक पंक्ति तुम्हारे भीतर की पूरी ऋतु बदल दे।
जीवन गणित नहीं है,
यहाँ दो और दो हर बार चार नहीं होते।
यहाँ कई बार बन्द दरवाज़े ही सबसे सुन्दर रास्तों की ओर खुलते हैं।
इसलिए
जब सब कुछ समाप्त प्रतीत हो, तब भी थोड़ा स्थान बचाकर रखना—
आश्चर्य के लिए, परिवर्तन के लिए, और उस संभावना के लिए
जो बिना सूचना दिए एक दिन तुम्हारे द्वार पर आ खड़ी होती है।
क्योंकि
सूखे वृक्षों ने भी वसन्त लौटते देखा है,
खण्डहरों ने भी पुनर्निर्माण का संगीत सुना है,
और जिन लोगों ने स्वयं को पूर्णतः हार चुका माना था,
उन्हीं में से कुछ ने सबसे अप्रत्याशित प्रभात देखे हैं।
इसलिए अभी निर्णय मत सुनाओ।
कहानी अभी अधूरी है।
समय के पास अब भी कुछ पृष्ठ शेष हैं।
🪶 𝐊𝐨𝐦𝐚𝐥 𝐑𝐚𝐣𝐩𝐮𝐭Читать полностью…
साहित्यिक लेखिका ✍️🌸
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वे गिनने लगे हैं अब तुम्हारी चुप्पियाँ,
कहीं ऐसा तो नहीं
कि तुमने किसी अन्याय पर
सोचना शुरू कर दिया हो।
वे डरते हैं उन लोगों से
जो प्रश्न पूछते हैं,
क्योंकि प्रश्नों के भीतर
साम्राज्य गिराने की आदत होती है।
हमें बचाकर रखना चाहिए प्रश्नों को
पीछे के कमरे में।
वे नापते हैं तुम्हारी आँखों की चमक,
कहीं ऐसा तो नहीं
कि तुम्हें अभी भी
किसी बेहतर संसार पर विश्वास हो।
कितना विचित्र समय है, मेरे प्रिय,
यहाँ निराशा को समझदारी
और आशा को मूर्खता कहा जाता है।
हमें छिपा देना चाहिए उम्मीद को
पीछे के कमरे में।
वे छीन लेना चाहते हैं
मनुष्य से उसका विस्मय,
ताकि वह आकाश को देखकर
सिर्फ़ मौसम बताए,
चमत्कार नहीं।
ताकि वह नदी में
केवल पानी देखे,
इतिहास नहीं।
हमें बचाकर रखना चाहिए विस्मय को
पीछे के कमरे में।
वे चाहते हैं
कि तुम काम करो,
थको,
सो जाओ,
और कभी यह मत पूछो
कि तुम्हारी थकान का लाभ
कौन उठा रहा है।
कितना विचित्र समय है, मेरे प्रिय,
जहाँ आज्ञाकारिता को सद्गुण
और जिज्ञासा को अपराध माना जाता है।
हमें छिपा देना चाहिए जिज्ञासा को
पीछे के कमरे में।
और यदि एक दिन
वे प्रेम, प्रकाश, आनंद,
ईश्वर और प्रश्न
सब खोज लें,
तो भी एक चीज़ बचाकर रखना—
मनुष्य होने की क्षमता।
क्योंकि जिस दिन यह खो जाएगी,
उस दिन कोई तानाशाह नहीं जीतेगा,
बल्कि मनुष्य स्वयं हार जाएगा।
हमें छिपा देना चाहिए मनुष्य को
पीछे के कमरे में।
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ज़िद का अंत हार पर नहीं होता,
ज़िद का अंत उस दिन होता है
जब मनुष्य स्वीकार कर लेता है कि संसार उसके बिना भी चल रहा था।
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ईश्वर तक पहुँचने के लिए लोग मंदिर खोजते हैं,
और मनुष्य तक पहुँचने के लिए दीवारें खड़ी कर देते हैं।
शायद सबसे बड़ा अधर्म यही है कि
हम प्रार्थनाओं में प्रेम माँगते हैं,
और व्यवहार में उसे बाँटने से डरते हैं।
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दूरी का प्रमाण....
लोग कहते हैं कि रिश्ते साथ रहने से बनते हैं,
पर मैंने कुछ ऐसे संबंध भी देखे हैं
जो वर्षों की दूरी में भी
अपना ताप नहीं खोते।
नदियाँ समुद्र तक पहुँचने से पहले
कितनी धरतियों से गुज़रती हैं,
फिर भी अपने उद्गम को
भूल नहीं जातीं।
शायद सच्चे संबंध भी ऐसे ही होते हैं—
उन्हें प्रतिदिन शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती,
वे स्मृति के शांत आकाश में
ध्रुवतारे की तरह टिके रहते हैं।
और तब समझ आता है,
जो रिश्ता हर दिन याद दिलाना पड़े,
वह निकटता हो सकता है;
पर जो चुप्पी में भी बना रहे,
वही आत्मीयता है।
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अधिकांश संबंध मृत्यु से नहीं मरते,
वे धीरे-धीरे महत्व खोने की बीमारी से मरते हैं।
और इस बीमारी का कोई श्मशान नहीं होता।
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🍁हैप्पीरक्षा_बंधन...🖋️
किसी के जख्मों पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा...।✍️
अगर बहने नहीं होंगी तो राखी कौन बांधेगा...?😊😊
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🌹 आपका दिन मंगलमय हो 🌹
सभी भाइयो और बहनो को रक्षा बंधन के पावन पर्व की शुभकामनायें ❤️❤️
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जिसे तुम अहंकार समझते हो,
संभव है वह व्यक्ति अपनी आत्मा को सस्ता बेचने से इंकार कर रहा हो।"
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हर समय स्वयं को सुधारते रहना भी एक प्रकार की थकान है। कभी-कभी आत्मा को सीख नहीं, सिर्फ़ एक शांत कोना चाहिए होता है।
लोग कहते हैं — खुद पर काम करो, और बेहतर बनो, और मजबूत बनो, और सफल बनो...
पर कोई यह नहीं पूछता कि
जो हर दिन टूटने से बच रहा है, क्या वह पहले से ही पर्याप्त संघर्ष नहीं कर रहा?
हमने जीवन को एक अंतहीन परीक्षा बना दिया है, जहाँ हर दिन स्वयं को साबित करना पड़ता है।
यदि दुःख है — उसे ठीक करो।
यदि अकेलापन है — उसे भर दो।
यदि भय है — उसे हरा दो।
यदि आँसू हैं — उन्हें छिपा दो।
पर कभी किसी ने यह नहीं कहा कि
कुछ पीड़ाएँ उपचार नहीं, सिर्फ़ स्वीकार चाहती हैं।
हर घाव मरहम से नहीं भरता, कुछ घाव समय के साथ हमारी पहचान का हिस्सा बन जाते हैं।
जिस प्रकार वृक्ष हर ऋतु में फूल नहीं देता,
उसी प्रकार मनुष्य भी हर समय प्रगति नहीं करता।
कुछ ऋतुएँ केवल जड़ों को बचाने के लिए होती हैं।
🌿
हम स्वयं को इतना तराशते रहते हैं कि एक दिन अपना ही स्पर्श अपरिचित लगने लगता है।
फिर अचानक समझ आता है —
आत्म-विकास का अर्थ स्वयं से युद्ध करना नहीं होता।
स्वयं को स्वीकारना भी एक साधना है।
हर भावना को अर्थ देना आवश्यक नहीं, हर चुप्पी को शब्द देना आवश्यक नहीं, हर टूटन को कहानी बनाना आवश्यक नहीं।
कुछ क्षण ऐसे भी होने चाहिए जहाँ हम स्वयं से कह सकें —
"आज मैं बेहतर नहीं बनूँगा, आज मैं बस रहूँगा।"
और शायद...
जीवन का सबसे दुर्लभ ज्ञान यही है कि
हर समय ऊँचा उठना आवश्यक नहीं, कभी-कभी गिरने से बच जाना भी उपलब्धि होती है।
हर समय बदलना आवश्यक नहीं, कभी-कभी स्वयं के पास लौट आना भी विकास होता है।
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साहित्यिक लेखिका ✍️🌸
कहते हैं — समय बदल गया है।
पर मैंने देखा है, समय नहीं बदलता, बस लोगों की सुविधाएँ अपने-अपने पक्ष चुन लेती हैं।
बेटी की उड़ान पर तालियाँ बजती हैं, बहू के पंखों पर प्रश्नचिह्न टाँक दिए जाते हैं।
दामाद के लिए सम्मान का दीप जलता है, और बेटे के हिस्से कर्तव्यों की राख छोड़ दी जाती है।
अजीब है यह संसार भी —
यहाँ न्याय का तराज़ू सिद्धांतों से नहीं, संबंधों से झुकता है।
किन्तु स्मरण रहे,
विचार तब तक पवित्र नहीं होते जब तक वे अपने और पराए के बीच एक-सा व्यवहार न कर सकें।
क्योंकि,
चरित्र की परीक्षा सभा में नहीं होती, वह तो तब होती है जब निर्णय अपने लोगों के विरुद्ध और सत्य के पक्ष में लेना पड़े।
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जो व्यक्ति हर संबंध के लिए अलग-अलग नैतिकता रखता है,
वह न्यायप्रिय नहीं, केवल पक्षपाती होता है।
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साहित्यिक लेखिका ✍️🌸
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तुमसे मोहब्बत में हार करके...
भर गया है दिल प्यार करके...
तुम्हें तो दिल का हर कोना दिखाया था,
अच्छा नहीं किया हर कोने पे वार करके...
अब किससे कहें दर्द-ए-दिल अपना,
जब तुम ही गए हो इनकार करके...
तेरी यादों से भी रिश्ता निभाते हैं,
बैठे हैं तन्हा ख़ुद को बेकरार करके...
तुम्हारी ख़ुशी की दुआ आज भी है,
हमने चाहा था तुम्हें बेशुमार करके...
तुम लौट भी आओ तो क्या फ़ायदा अब,
टूट चुके हैं हम इंतज़ार करके...
जिसे अपना समझकर सब कुछ सौंप दिया,
वही चला गया हमें लाचार करके...
अब मोहब्बत से डरने लगे हैं हम,
देखा है अंजाम तुमसे प्यार करके...
कभी पूछ लेना मेरी ख़ामोशी से,
क्या मिला तुम्हें मुझे ख़ाकसार करके...
हमने तो निभाई थी आख़िरी साँस तक,
तुमने भुला दिया बस एक बार करके...
✍🏿 शिवा