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कुछ सत्य इसलिए अनकहे रह जाते हैं,
क्योंकि उन्हें स्वीकारते ही अपने ही चरित्र से बहस करनी पड़ती है।
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मुस्कुराहट का दौर बहुत छोटा है,
उसके बाद हर किरदार आईने के सामने बेनक़ाब होता है!!
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“या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥”
शक्ति-उपासना के पावन पर्व नवरात्रि की सभी ग्रुपवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ। माँ दुर्गा की कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आए तथा राष्ट्र की एकता और प्रगति का हमारा संकल्प और सशक्त हो।
जय माता दी! 🙏
प्रतीक्षा का भ्रम
मनुष्य का सबसे पुराना छलावा भविष्य नहीं,
"उचित समय" का विचार है।
वह जीवनभर किसी शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा करता है,
मानो परिवर्तन आकाश से उतरने वाली कोई घटना हो,
जबकि सत्य यह है कि परिवर्तन सदैव
एक असुविधाजनक क्षण से जन्म लेता है।
हम कहते हैं —
अभी नहीं, कुछ समय बाद...
जब परिस्थितियाँ अनुकूल होंगी,
जब भय कम होगा,
जब मन स्थिर होगा।
पर विडम्बना देखिए...
परिस्थितियाँ कभी पूर्ण नहीं होतीं,
वे केवल बदलती रहती हैं।
जो व्यक्ति साहस आने की प्रतीक्षा करता है,
वह प्रायः साहस के आने से पहले ही
अपने अनेक अवसरों का अंतिम संस्कार कर देता है।
मैंने पाया है कि—
आत्मविश्वास आरम्भ का कारण नहीं होता,
वह आरम्भ का परिणाम होता है।
नदी तैरना सीख लेने वालों के लिए शांत नहीं होती,
बल्कि जो जल में उतर जाते हैं,
उन्हीं के लिए तैरना संभव होता है।
जीवन में सबसे गहरी दूरियाँ
स्थान की नहीं होतीं,
वे उस व्यक्ति और उसके स्वप्न के बीच होती हैं
जो केवल सोचता है,
पर पहला कदम नहीं उठाता।
क्योंकि...
समय कभी तैयार नहीं मिलता,
उसे तैयार करना पड़ता है।
और अवसर कभी द्वार नहीं खटखटाते,
उन्हें संकोच, संशय और भय की परतों के भीतर से
पहचानना पड़ता है।
इसलिए प्रतीक्षा मत कीजिए।
कहीं ऐसा न हो कि
जिस क्षण की आप प्रतीक्षा कर रहे हैं,
वह स्वयं आपकी प्रतीक्षा करते-करते
इतिहास बन जाए।
और तब...
सबसे बड़ा दुःख असफलता नहीं होगा,
बल्कि यह बोध होगा कि—
आपमें उड़ने की क्षमता थी,
पर आपने जीवन भर
अनुकूल हवा की प्रतीक्षा ही की।
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कल्पना भविष्य का चित्र अंकित कर सकती है,
किन्तु उस चित्र में प्राण प्रतिष्ठित करने का कार्य
केवल कर्म ही करता है।
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अत्यधिक आत्मीयता का परिणाम प्रायः विरक्ति नहीं,
अपितु वह अदृश्य अभियोग होता है
जिसकी सुनवाई केवल स्मृतियाँ करती हैं।
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साँप का विष रक्त में फैलता है,
मनुष्य का विष संबंधों में;एक जीवन लेता है,
दूसरा जीवन भर का विश्वास।
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अहंकार कहता है — 'यह मेरा है',
विवेक पूछता है — 'तुम्हारा कब से?'
और समय मुस्कुराकर दोनों को देखता रहता है।"
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मैंने खोया बहुत कम था,
पर त्याग इतना किया
कि लोग मुझे विरक्त समझ बैठे।
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जंगल की सबसे बड़ी सीख 🌿
हमने हमेशा पेड़ों को लकड़ी समझा,
छाया समझा,
फल समझा,
लेकिन बहुत कम लोगों ने उन्हें स्मृति समझा।
एक जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता,
वह समय का वह ग्रंथ होता है
जिसे धरती अपनी जड़ों की स्याही से लिखती है। 🍂
किसी पुराने वृक्ष के पास खड़े होकर देखिए...
वह केवल खड़ा नहीं होता,
वह उन ऋतुओं का इतिहास होता है
जिन्हें हम जीकर भूल चुके होते हैं।
उसने आँधियाँ भी देखी होती हैं,
सूखे भी,
बाढ़ भी,
और उन पक्षियों की पीढ़ियाँ भी
जिनके नाम तक अब किसी को याद नहीं।
फिर भी वह शिकायत नहीं करता।
यहीं जंगल मनुष्य से बड़ा हो जाता है। 🌳
मनुष्य अपने घाव गिनता है,
जंगल अपने घावों को मिट्टी में बदल देता है।
मनुष्य हार के बाद टूट जाता है,
जंगल हार के बाद उगता है।
गिरा हुआ पत्ता जंगल के लिए मृत्यु नहीं होता,
वह आने वाले वसंत की तैयारी होता है। 🌱
शायद इसी कारण
प्रकृति में कहीं भी कूड़ा नहीं मिलता,
क्योंकि वहाँ हर अंत
किसी नई शुरुआत का भोजन बन जाता है।
और हम...?
हम अपने भीतर की टूटी चीज़ों को
सालों तक ढोते रहते हैं।
जंगल सिखाता है कि
जो गिर गया है,
उसे पकड़े मत रहो।
उसे मिट्टी बनने दो।
🍁
एक और बात...
जंगल का सबसे विशाल वृक्ष
सबसे ऊँची आवाज़ नहीं करता।
उसकी महानता उसके शोर में नहीं,
उसकी जड़ों में होती है।
आज दुनिया में हर कोई दिखाई देना चाहता है,
पर प्रकृति कहती है—
जो सबसे अधिक देता है,
वह अक्सर सबसे कम दिखाई देता है।
जड़ें कभी तालियाँ नहीं मांगतीं।
🌿
हम बच्चों को सफलता सिखाते हैं,
पर जंगल सहयोग सिखाता है।
एक वृक्ष अकेला जंगल नहीं बनाता।
फफूँदी, काई, मिट्टी, वर्षा, हवा, पक्षी, कीट...
सब मिलकर एक वृक्ष को वृक्ष बनाते हैं।
फिर भी मनुष्य अपनी उपलब्धियों के नीचे
केवल अपना नाम लिखना चाहता है।
🍂
कभी-कभी मुझे लगता है,
धरती पर सबसे बुद्धिमान जीव मनुष्य नहीं,
जंगल हैं।
क्योंकि वे जानते हैं—
ऊँचा उठने का अर्थ
दूसरों से ऊपर होना नहीं,
दूसरों से जुड़ा होना है।
🌳✨
और शायद...
जिस दिन हम पेड़ों को वस्तु नहीं,
वरिष्ठ मानना सीख जाएंगे,
जिस दिन हम जंगलों को संसाधन नहीं,
रिश्तेदार समझने लगेंगे,
उसी दिन हम प्रकृति को नहीं बचाएंगे...
बल्कि स्वयं को बचा लेंगे।
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कुछ लोग ख़ुद ही आग लगाते हैं,
फिर हमें धुएँ से बचाने का दावा करते हैं!!
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चिन्ता का सबसे सूक्ष्म छल यह है कि वह अभी घटित न हुई विपत्ति को भी वर्तमान का दण्ड बना देती है।
मन किसी अनागत आशंका की परिक्रमा करते-करते इतना थक जाता है कि सामने उपस्थित जीवन को अनुभव करने की सामर्थ्य ही खोने लगता है।
ऐसे समय स्वयं को समझाने के लिए तर्कों का अम्बार मत लगाइए; कभी-कभी विचारों को परास्त करने से पहले, उस थकान को पहचानना आवश्यक होता है, जो उन्हें निरन्तर जन्म दे रही है।
अपने भीतर उठते प्रत्येक प्रश्न का उसी क्षण उत्तर खोजना अनिवार्य नहीं। कुछ आशंकाएँ समाधान नहीं, हमारी अनिश्चितता सहने की क्षमता माँगती हैं। श्वास की गति को सहज होने दीजिए, थोड़ी देर चलिए, जल पीजिए, और अपनी चेतना को उस क्षण में लौटाइए जो वास्तव में आपके सम्मुख है—उस कल्पित भविष्य में नहीं, जिसे आपका भय बार-बार रच रहा है।
स्मरण रखिए, मन में उठने वाला प्रत्येक विचार सत्य का साक्ष्य नहीं होता; कुछ विचार केवल थके हुए चित्त की आशंकाएँ होते हैं। उन्हें सुनना आवश्यक हो सकता है, पर उनकी प्रत्येक बात को जीवन का निर्णय मान लेना आवश्यक नहीं।
और यदि यह व्याकुलता बार-बार लौटे, दैनिक जीवन को प्रभावित करे अथवा असहनीय लगे, तो किसी योग्य मानसिक-स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सहायता लेना भी आत्मबोध का ही एक रूप है।
मनुष्य की शान्ति इस बात में नहीं कि उसके भीतर कभी कोई आशंका जन्म ही न ले; शान्ति तब आरम्भ होती है, जब वह प्रत्येक आशंका को अपने भविष्य का स्वामी बनाना छोड़ देता है।
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⚜️ आत्मा पर अधिकार का अदृश्य षड्यंत्र ⚜️
कुछ लोग तुम्हें बाँधते नहीं, तुम्हारे भीतर ही ऐसी ग्रंथियाँ निर्मित कर देते हैं कि तुम अपनी स्वतंत्रता को भी अपराध समझने लगते हो। वे तुम्हारे निर्णयों पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, तुम्हारी संवेदनाओं को अतिशयोक्ति कहते हैं और अंततः तुम्हें ही अपने सत्य का प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए विवश कर देते हैं।
विसंगति देखो— तुम्हें चोट किसी और के व्यवहार से लगती है, किंतु क्षमा माँगने के लिए तुम्हारे ही होंठ खुलते हैं। तुम अपनी पीड़ा समझाने में इतने व्यस्त हो जाते हो कि उस व्यक्ति के आचरण का परीक्षण करना ही भूल जाते हो, जिसने तुम्हें उस पीड़ा तक पहुँचाया था।
धीरे-धीरे तुम अपने ही अंतर्मन के विरुद्ध साक्ष्य जुटाने लगते हो। जो बात कल तक तुम्हें अनुचित लगती थी, आज उसे अपनी भूल मानने लगते हो। अपनी सीमाओं को कठोरता, अपने प्रतिरोध को अहंकार और अपनी चुप्पी को अपराध समझ बैठते हो। यही वह सूक्ष्म बिंदु है, जहाँ किसी दूसरे का प्रभाव तुम्हारे आत्मबोध का अपहरण करने लगता है।
परंतु स्मरण रखना—प्रत्येक असहमति छल नहीं होती, प्रत्येक अप्रिय व्यक्ति कुटिल नहीं होता। वास्तविक अंतर किसी एक घटना में नहीं, बल्कि उस व्यवहार की पुनरावृत्ति में दिखाई देता है, जहाँ तुम्हारी असहमति का सम्मान नहीं होता, तुम्हारी सीमाएँ बार-बार लाँघी जाती हैं और तुम्हारी भावनाओं को तुम्हारे विरुद्ध ही प्रयुक्त किया जाता है।
आत्मीयता वह नहीं, जिसमें तुम्हें स्वयं को मिटाकर किसी दूसरे के अनुकूल होना पड़े; आत्मीयता वह है, जिसमें तुम्हारा स्वतंत्र अस्तित्व भी सुरक्षित रहे।
क्योंकि जिस संबंध को जीवित रखने के लिए तुम्हें बार-बार अपनी ही संवेदनाओं का गला घोंटना पड़े, वहाँ केवल संबंध नहीं बचाया जा रहा होता—संभव है, वहाँ तुम्हारी आत्मस्वीकृति की बलि दी जा रही हो।
और अंततः, अपने भीतर यह प्रश्न अवश्य जीवित रखना
जिस व्यक्ति के सामने मुझे हर बार अपनी निर्दोषता सिद्ध करनी पड़ती है, क्या वह वास्तव में मुझे समझना चाहता है, अथवा मुझे सदैव अपराधबोध में रखना उसके लिए अधिक सुविधाजनक है?
🪞 कभी-कभी मुक्ति किसी व्यक्ति को छोड़ने से पहले, उसके द्वारा गढ़ी गई अपनी उस छवि को अस्वीकार करने से आरंभ होती है, जिसमें तुम सदैव दोषी ठहराए जाते रहे। 🕯️
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जो अपनी जड़ों को अपनी ऊँचाई का श्रेय नहीं देता,
वह भूल जाता है कि आकाश की ओर बढ़ना उसकी उपलब्धि अवश्य थी,
किंतु खड़े रहने की क्षमता उसे विरासत में मिली थी।
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सोचता हूँ ख़ुद से मिलूँ किसी दिन,
फिर सोचता हूँ क्या कहूँगा, कहा था इतने दिन।
जो बात दिल में थी, लब तक आ न सकी,
वो बात पूछेगा मुझसे मेरा गुज़रा हुआ दिन।
आईने के सामने खड़ा रहा देर तक,
चेहरा तो मेरा था, पर अजनबी था वो दिन।
कुछ ख़्वाब आँखों में अब भी ठहरे हुए,
कुछ ख़्वाब ले गया मुझसे मेरा गुज़रा हुआ दिन।
मैं ख़ुद को ढूँढ़ता रहा शहर-ए-ज़िंदगी में,
और ख़ुद ही से बिछड़ गया जाने किस दिन।
जो शख़्स सबको हँसाता रहा उम्र भर,
उस शख़्स ने चुपके से रोया था किसी दिन।
अब मिल भी जाऊँ ख़ुद से तो शायद न पहचानूँ,
इतना बदल गया हूँ मैं अपने ही सफ़र में।
बस एक सवाल है जो दिल से जाता नहीं—
तू ख़ुद से क्यों न मिला, जब तेरा था हर दिन?
✍🏿 शिवा
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मौन का जलाशय
बहुत दिनों तक कुछ नहीं होता,
और हमें भ्रम हो जाता है कि सब शांत है।
फिर अचानक कोई पुराना नाम,
कोई भूला हुआ स्पर्श,
कोई अधूरी बातचीत,
मन के जल में गिरा एक छोटा-सा कंकड़ बन जाती है।
उस क्षण समझ में आता है—
शोर कभी बाहर नहीं था,
वह तो भीतर सोया हुआ था।
कुछ स्मृतियाँ झील की तलछट जैसी होती हैं,
वे दिखाई नहीं देतीं,
पर एक हलचल होते ही
पूरा जल धुँधला कर देती हैं।
मनुष्य भी कितना जल-जैसा है—
ऊपर से निश्चल,
भीतर से तरंगित।
और कभी-कभी...
एक क्षण की आहट
वर्षों के संयम को उतनी ही सरलता से तोड़ देती है,
जितनी सरलता से
एक कंकड़
पूरी झील की गहराइयों को जगा देता है।
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Teri deewani ❤️🥺
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वक़्त कम मिला साथ वक़्त बिताने को,
फिर एक जन्म लेंगे तुमसे मुकम्मल इश्क़ फ़रमाने को।
इस जन्म की मोहब्बत अधूरी ही सही,
रखेंगे तेरा नाम हर साँस में सजाने को।
कुछ ख़्वाब तेरे थे, कुछ मेरे थे मगर,
रात कम पड़ गई उन्हें हक़ीक़त बनाने को।
तेरी आँखों में जो सुकून मिला था कभी,
तरसते रहे उम्र भर वही पल दोहराने को।
हमने तो चाहा था उम्र भर साथ तेरा,
मगर फ़ासले मिल गए हमें आज़माने को।
जो बात कह न सके इस जन्म में तुमसे,
अगले जन्म आएँगे वही दिल से सुनाने को।
अगर वहाँ भी किस्मत ने जुदा कर दिया,
तो फिर जन्म लेंगे तुझे अपना बनाने को।
मोहब्बत हमारी कोई कहानी नहीं होगी,
हम लौटेंगे हर बार इसे मुकम्मल बनाने को।
वक़्त कम मिला था, ये मलाल रहेगा मगर,
जनमों तक इंतज़ार रहेगा तेरा साथ निभाने को।
✍🏿 शिवा
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अतीत एक कब्र नहीं है,
पर बहुत से लोग उसे घर बना लेते हैं।
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सबको न्याय चाहिए,
लेकिन अपने पक्ष में।"
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