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कल्पना भविष्य का चित्र अंकित कर सकती है,
किन्तु उस चित्र में प्राण प्रतिष्ठित करने का कार्य
केवल कर्म ही करता है।
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अत्यधिक आत्मीयता का परिणाम प्रायः विरक्ति नहीं,
अपितु वह अदृश्य अभियोग होता है
जिसकी सुनवाई केवल स्मृतियाँ करती हैं।
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साँप का विष रक्त में फैलता है,
मनुष्य का विष संबंधों में;एक जीवन लेता है,
दूसरा जीवन भर का विश्वास।
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अहंकार कहता है — 'यह मेरा है',
विवेक पूछता है — 'तुम्हारा कब से?'
और समय मुस्कुराकर दोनों को देखता रहता है।"
🍂⚜️Читать полностью…
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मैंने खोया बहुत कम था,
पर त्याग इतना किया
कि लोग मुझे विरक्त समझ बैठे।
🍂⚜️Читать полностью…
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जंगल की सबसे बड़ी सीख 🌿
हमने हमेशा पेड़ों को लकड़ी समझा,
छाया समझा,
फल समझा,
लेकिन बहुत कम लोगों ने उन्हें स्मृति समझा।
एक जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता,
वह समय का वह ग्रंथ होता है
जिसे धरती अपनी जड़ों की स्याही से लिखती है। 🍂
किसी पुराने वृक्ष के पास खड़े होकर देखिए...
वह केवल खड़ा नहीं होता,
वह उन ऋतुओं का इतिहास होता है
जिन्हें हम जीकर भूल चुके होते हैं।
उसने आँधियाँ भी देखी होती हैं,
सूखे भी,
बाढ़ भी,
और उन पक्षियों की पीढ़ियाँ भी
जिनके नाम तक अब किसी को याद नहीं।
फिर भी वह शिकायत नहीं करता।
यहीं जंगल मनुष्य से बड़ा हो जाता है। 🌳
मनुष्य अपने घाव गिनता है,
जंगल अपने घावों को मिट्टी में बदल देता है।
मनुष्य हार के बाद टूट जाता है,
जंगल हार के बाद उगता है।
गिरा हुआ पत्ता जंगल के लिए मृत्यु नहीं होता,
वह आने वाले वसंत की तैयारी होता है। 🌱
शायद इसी कारण
प्रकृति में कहीं भी कूड़ा नहीं मिलता,
क्योंकि वहाँ हर अंत
किसी नई शुरुआत का भोजन बन जाता है।
और हम...?
हम अपने भीतर की टूटी चीज़ों को
सालों तक ढोते रहते हैं।
जंगल सिखाता है कि
जो गिर गया है,
उसे पकड़े मत रहो।
उसे मिट्टी बनने दो।
🍁
एक और बात...
जंगल का सबसे विशाल वृक्ष
सबसे ऊँची आवाज़ नहीं करता।
उसकी महानता उसके शोर में नहीं,
उसकी जड़ों में होती है।
आज दुनिया में हर कोई दिखाई देना चाहता है,
पर प्रकृति कहती है—
जो सबसे अधिक देता है,
वह अक्सर सबसे कम दिखाई देता है।
जड़ें कभी तालियाँ नहीं मांगतीं।
🌿
हम बच्चों को सफलता सिखाते हैं,
पर जंगल सहयोग सिखाता है।
एक वृक्ष अकेला जंगल नहीं बनाता।
फफूँदी, काई, मिट्टी, वर्षा, हवा, पक्षी, कीट...
सब मिलकर एक वृक्ष को वृक्ष बनाते हैं।
फिर भी मनुष्य अपनी उपलब्धियों के नीचे
केवल अपना नाम लिखना चाहता है।
🍂
कभी-कभी मुझे लगता है,
धरती पर सबसे बुद्धिमान जीव मनुष्य नहीं,
जंगल हैं।
क्योंकि वे जानते हैं—
ऊँचा उठने का अर्थ
दूसरों से ऊपर होना नहीं,
दूसरों से जुड़ा होना है।
🌳✨
और शायद...
जिस दिन हम पेड़ों को वस्तु नहीं,
वरिष्ठ मानना सीख जाएंगे,
जिस दिन हम जंगलों को संसाधन नहीं,
रिश्तेदार समझने लगेंगे,
उसी दिन हम प्रकृति को नहीं बचाएंगे...
बल्कि स्वयं को बचा लेंगे।
🪶 𝐊𝐨𝐦𝐚𝐥 𝐑𝐚𝐣𝐩𝐮𝐭Читать полностью…
साहित्यिक लेखिका ✍️
ㅤ ㅤㅤㅤㅤ️️
धूल में घिरे हुए लोग
धूल में घिरे हुए लोग
रास्तों को दोष नहीं देते।
वे अपनी आँखों से
बार-बार झाड़ते हैं धूल,
और फिर देखना शुरू कर देते हैं
उसी दिशा में
जहाँ कुछ देर पहले
दुनिया धुँधली पड़ गई थी।
धूल में घिरे हुए लोग
अपने साथ ले चलते हैं
एक पुरानी हँसी,
कुछ अधूरे वाक्य,
कुछ नाम
जिन्हें वे किसी भी मौसम में
भूल नहीं पाते।
वे जेबों में नहीं,
स्मृतियों में रखते हैं
अपना सबसे कीमती सामान।
---
फिर एक दिन
उड़ जाती है छत,
बिखर जाते हैं सपनों के बर्तन,
रिश्तों की अलमारियाँ
अचानक खाली हो जाती हैं।
बहुत-सी आवाज़ें
घर छोड़कर चली जाती हैं।
बहुत-से चेहरे
सिर्फ तस्वीरों में बचते हैं।
लेकिन धूल में घिरे हुए लोग
शिकायत नहीं करते।
वे अपने भीतर
किसी कोने में बचाकर रखते हैं
एक छोटा-सा कारण
जीते रहने का।
---
शाम होती है।
आकाश पर
थकान का रंग उतर आता है।
और वे
दिन भर की पराजयों को
एक पुराने कपड़े की तरह झाड़कर
दरवाज़े के पीछे टाँग देते हैं।
फिर चुपचाप
अगले दिन की तैयारी करने लगते हैं।
---
धूल में घिरे हुए लोग
अद्भुत होते हैं।
वे जानते हैं
कि संसार हमेशा न्यायपूर्ण नहीं होता,
फिर भी
वे बच्चों को सपने सिखाते हैं।
वे जानते हैं
कि हर बीज वृक्ष नहीं बनता,
फिर भी
वे मिट्टी में बीज डालते हैं।
---
रात के सबसे शांत पहर में
जब सब कुछ सो जाता है,
तब भी
उनके भीतर
कहीं बहुत गहरे
एक छोटी-सी उम्मीद
जलती रहती है।
उसी उम्मीद की लौ में
वे पहचानते हैं स्वयं को।
---
और हर बार
जब दुनिया उन्हें टूटता हुआ समझती है,
उसी समय
उनके भीतर
किसी अदृश्य जड़ में
कुछ फिर से उगने लगता है।
धीरे-धीरे...
बहुत धीरे...
जैसे सूखी धरती के भीतर
पानी लौटता है।
🪶 𝐊𝐨𝐦𝐚𝐥 𝐑𝐚𝐣𝐩𝐮𝐭Читать полностью…
साहित्यिक लेखिका ✍️🌸
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स्मृतियों के उस आसेब-ज़दा मंदिर में,
यह दिल आज भी एक अनुष्ठान है;
जहाँ हर शाम विरह की आंच में,
स्मृतियाँ संदल की तरह सुलगकर सुवासित
होती हैं।"
♥️Читать полностью…
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खटकना
वह तब तक सबको अच्छी लगती रही,
जब तक उसके हाथों में
दूसरों के आँगन की धूल लगी थी।
जब तक उसकी पीठ पर
मजबूरियों का गठ्ठर बँधा था,
और उसकी आँखों में
अपेक्षाओं से अधिक भय रहता था।
लोग उसे अपनापन कहते थे,
क्योंकि वह नीचे खड़ी थी।
फिर एक दिन
उसके घर की टूटी देहरी पर
सुख ने धीरे से दस्तक दी।
न कोई चमत्कार हुआ,
न कोई विरासत मिली,
बस वर्षों की तपती दोपहरें
एक छाँव में बदल गईं।
और तभी
लोगों के चेहरे बदलने लगे।
जो कल तक उसके दुःख में
सहानुभूति ढूँढ़ते थे,
आज उसकी प्रसन्नता में
अहंकार खोजने लगे।
उसे तब समझ आया—
समस्या उसकी ग़रीबी नहीं थी,
समस्या यह थी कि
ग़रीबी उसकी स्थायी पहचान मानी जा चुकी थी।
समाज अक्सर अभाव पर दया करता है,
पर अभाव से बाहर निकलते मनुष्य को
सहजता से स्वीकार नहीं करता।
उसे दुखी देखना आसान है,
सफल देखना कठिन।
क्योंकि किसी का उठना
कई लोगों को अपने ठहराव का आईना दिखा देता है।
तब से वह चुप है।
न किसी से शिकायत,
न किसी से बहस।
बस मन ही मन
एक बात समझ गई है—
मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि
ऊँचा उठना नहीं,
ऊँचा उठकर भी
कड़वाहट से बच जाना है।
और शायद...
यही वह वैभव है
जिसे कोई ईर्ष्या
कभी छीन नहीं सकती।
🪶 𝐊𝐨𝐦𝐚𝐥 𝐑𝐚𝐣𝐩𝐮𝐭Читать полностью…
साहित्यिक लेखिका ✍️🌸
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अभी शेष है
जो चला गया है, उसे अन्त मत समझो।
बहुत बार जीवन विराम के वस्त्र पहनकर आता है, और हम उसे पूर्णविराम समझ बैठते हैं।
तुम्हें लगता है सब कुछ यहीं समाप्त हो गया,
पर समय की जेब में अब भी कई अनखुले दिवस पड़े हैं।
अभी कई दृश्य शेष हैं, कई संवाद अनकहे हैं, कई पात्रों ने अभी रंगमंच पर प्रवेश ही नहीं किया।
यह जो अन्धकार है, यह सूर्य का विरोध नहीं, उसकी प्रस्तावना भी हो सकता है।
यह जो टूटन है, संभव है इसी में किसी नये आकार का बीज रखा हो।
कौन जानता है—
कल किसी भूली हुई गली में तुम्हें अपना ही कोई खोया हुआ स्वर मिल जाए,
किसी साधारण-सी भेंट में वर्षों से लापता प्रसन्नता मिल जाए,
या किसी अनजान मनुष्य की एक पंक्ति तुम्हारे भीतर की पूरी ऋतु बदल दे।
जीवन गणित नहीं है,
यहाँ दो और दो हर बार चार नहीं होते।
यहाँ कई बार बन्द दरवाज़े ही सबसे सुन्दर रास्तों की ओर खुलते हैं।
इसलिए
जब सब कुछ समाप्त प्रतीत हो, तब भी थोड़ा स्थान बचाकर रखना—
आश्चर्य के लिए, परिवर्तन के लिए, और उस संभावना के लिए
जो बिना सूचना दिए एक दिन तुम्हारे द्वार पर आ खड़ी होती है।
क्योंकि
सूखे वृक्षों ने भी वसन्त लौटते देखा है,
खण्डहरों ने भी पुनर्निर्माण का संगीत सुना है,
और जिन लोगों ने स्वयं को पूर्णतः हार चुका माना था,
उन्हीं में से कुछ ने सबसे अप्रत्याशित प्रभात देखे हैं।
इसलिए अभी निर्णय मत सुनाओ।
कहानी अभी अधूरी है।
समय के पास अब भी कुछ पृष्ठ शेष हैं।
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वे गिनने लगे हैं अब तुम्हारी चुप्पियाँ,
कहीं ऐसा तो नहीं
कि तुमने किसी अन्याय पर
सोचना शुरू कर दिया हो।
वे डरते हैं उन लोगों से
जो प्रश्न पूछते हैं,
क्योंकि प्रश्नों के भीतर
साम्राज्य गिराने की आदत होती है।
हमें बचाकर रखना चाहिए प्रश्नों को
पीछे के कमरे में।
वे नापते हैं तुम्हारी आँखों की चमक,
कहीं ऐसा तो नहीं
कि तुम्हें अभी भी
किसी बेहतर संसार पर विश्वास हो।
कितना विचित्र समय है, मेरे प्रिय,
यहाँ निराशा को समझदारी
और आशा को मूर्खता कहा जाता है।
हमें छिपा देना चाहिए उम्मीद को
पीछे के कमरे में।
वे छीन लेना चाहते हैं
मनुष्य से उसका विस्मय,
ताकि वह आकाश को देखकर
सिर्फ़ मौसम बताए,
चमत्कार नहीं।
ताकि वह नदी में
केवल पानी देखे,
इतिहास नहीं।
हमें बचाकर रखना चाहिए विस्मय को
पीछे के कमरे में।
वे चाहते हैं
कि तुम काम करो,
थको,
सो जाओ,
और कभी यह मत पूछो
कि तुम्हारी थकान का लाभ
कौन उठा रहा है।
कितना विचित्र समय है, मेरे प्रिय,
जहाँ आज्ञाकारिता को सद्गुण
और जिज्ञासा को अपराध माना जाता है।
हमें छिपा देना चाहिए जिज्ञासा को
पीछे के कमरे में।
और यदि एक दिन
वे प्रेम, प्रकाश, आनंद,
ईश्वर और प्रश्न
सब खोज लें,
तो भी एक चीज़ बचाकर रखना—
मनुष्य होने की क्षमता।
क्योंकि जिस दिन यह खो जाएगी,
उस दिन कोई तानाशाह नहीं जीतेगा,
बल्कि मनुष्य स्वयं हार जाएगा।
हमें छिपा देना चाहिए मनुष्य को
पीछे के कमरे में।
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ज़िद का अंत हार पर नहीं होता,
ज़िद का अंत उस दिन होता है
जब मनुष्य स्वीकार कर लेता है कि संसार उसके बिना भी चल रहा था।
🪶Читать полностью…
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मौन का जलाशय
बहुत दिनों तक कुछ नहीं होता,
और हमें भ्रम हो जाता है कि सब शांत है।
फिर अचानक कोई पुराना नाम,
कोई भूला हुआ स्पर्श,
कोई अधूरी बातचीत,
मन के जल में गिरा एक छोटा-सा कंकड़ बन जाती है।
उस क्षण समझ में आता है—
शोर कभी बाहर नहीं था,
वह तो भीतर सोया हुआ था।
कुछ स्मृतियाँ झील की तलछट जैसी होती हैं,
वे दिखाई नहीं देतीं,
पर एक हलचल होते ही
पूरा जल धुँधला कर देती हैं।
मनुष्य भी कितना जल-जैसा है—
ऊपर से निश्चल,
भीतर से तरंगित।
और कभी-कभी...
एक क्षण की आहट
वर्षों के संयम को उतनी ही सरलता से तोड़ देती है,
जितनी सरलता से
एक कंकड़
पूरी झील की गहराइयों को जगा देता है।
🪷🤍Читать полностью…
Teri deewani ❤️🥺
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💔🥀
वक़्त कम मिला साथ वक़्त बिताने को,
फिर एक जन्म लेंगे तुमसे मुकम्मल इश्क़ फ़रमाने को।
इस जन्म की मोहब्बत अधूरी ही सही,
रखेंगे तेरा नाम हर साँस में सजाने को।
कुछ ख़्वाब तेरे थे, कुछ मेरे थे मगर,
रात कम पड़ गई उन्हें हक़ीक़त बनाने को।
तेरी आँखों में जो सुकून मिला था कभी,
तरसते रहे उम्र भर वही पल दोहराने को।
हमने तो चाहा था उम्र भर साथ तेरा,
मगर फ़ासले मिल गए हमें आज़माने को।
जो बात कह न सके इस जन्म में तुमसे,
अगले जन्म आएँगे वही दिल से सुनाने को।
अगर वहाँ भी किस्मत ने जुदा कर दिया,
तो फिर जन्म लेंगे तुझे अपना बनाने को।
मोहब्बत हमारी कोई कहानी नहीं होगी,
हम लौटेंगे हर बार इसे मुकम्मल बनाने को।
वक़्त कम मिला था, ये मलाल रहेगा मगर,
जनमों तक इंतज़ार रहेगा तेरा साथ निभाने को।
✍🏿 शिवा
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अतीत एक कब्र नहीं है,
पर बहुत से लोग उसे घर बना लेते हैं।
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सबको न्याय चाहिए,
लेकिन अपने पक्ष में।"
⚖️Читать полностью…
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किसी अनकहे प्रदेश में
किसी अनकहे प्रदेश में
मैं अब भी खड़ी हूँ,
जहाँ स्मृतियाँ पेड़ों की तरह नहीं उगतीं,
वे धुंध की तरह उतरती हैं।
मेरे चारों ओर फैला हुआ है
वह सब,
जो कभी घटा नहीं,
फिर भी मुझे बदल गया।
रात की सबसे शांत परत में
मैंने कई बार सुना है
अपने ही भीतर से आती हुई
किसी अपरिचित की पदचाप।
मानो मेरे भीतर
कोई और भी रहता हो,
जो मुझसे पहले जन्मा था
और मुझसे बाद तक जीवित रहेगा।
मैं उसे नाम नहीं दे पाती।
नाम सीमाएँ बना देते हैं,
और वह सीमा नहीं,
एक दिशा है।
कभी-कभी लगता है
मनुष्य की सबसे बड़ी इच्छा
किसी को पा लेना नहीं,
किसी के भीतर
पहचाना जाना है।
शायद इसी कारण
हम जीवन भर
शब्दों से अधिक संकेतों में जीते हैं।
एक दृष्टि,
एक मौन,
एक अधूरी स्मृति,
और वर्षों तक
उनका अर्थ खुलता रहता है।
मेरे सामने अब भी
वह विस्तृत आकाश पड़ा है
जिस तक मैं पहुँची नहीं,
और मेरे भीतर अब भी
वह पक्षी जीवित है
जिसने उड़ान भरी नहीं।
पर आश्चर्य यह है कि
अपूर्णता भी कभी-कभी
इतनी सुंदर होती है
कि मन उसे पूर्ण होने से बचाना चाहता है।
और तब...
हम किसी मंज़िल की ओर नहीं,
किसी अर्थ की ओर चल रहे होते हैं।
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उड़ान का अपराध
मैं भी जा सकती थी।
खोल सकती थी एक सुबह अपने भीतर वर्षों से बंद पड़ा आकाश,
और छोड़ सकती थी पीछे वे सब आवाज़ें जो मुझे मेरे नाम से नहीं, मेरी ज़िम्मेदारियों से पुकारती थीं।
मैं भी चुन सकती थी एक नदी, एक रास्ता, एक प्रेम, एक स्वतंत्र जीवन।
पर कुछ घर ईंटों से नहीं टिके होते,
वे टिके होते हैं किसी एक व्यक्ति की अधूरी इच्छाओं पर।
मैं चली जाऊँ तो शायद मुझे आकाश मिल जाए,
लेकिन मेरे हिस्से का जो दीपक इस घर में जल रहा है,
उसकी लौ कौन बनेगा?
यही तो विडम्बना है—
पिंजरे में रहने वाली हर चिड़िया उड़ना नहीं भूलती,
वह केवल यह हिसाब लगाती रहती है कि उसकी उड़ान की कीमत किसे चुकानी पड़ेगी।
इसलिए मैं रुकी हुई हूँ।
कमज़ोरी से नहीं, प्रेम से।
और कई बार प्रेम मुक्ति नहीं देता,
प्रेम मनुष्य को स्वेच्छा से बंधन चुनना सिखाता है।
🕯️
सबसे कठिन कैद लोहे की नहीं होती,
सबसे कठिन कैद वह होती है
जिसका ताला प्रेम से बना हो।
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अगर...
अगर तुम उस समय भी शांत रह सको
जब तुम्हारे विरुद्ध सबसे ऊँची आवाज़ें उठ रही हों,
और तुम्हें अपनी सफ़ाई देने से अधिक
अपने सत्य पर भरोसा हो।
अगर तुम लोगों की राय सुन सको,
पर अपना विवेक गिरवी न रखो,
और भीड़ के शोर में भी
अपने भीतर की धीमी आवाज़ पहचान लो।
अगर तुम हारने के बाद
परिणाम से नहीं,
अपने प्रयास से प्रश्न कर सको,
और जीतने के बाद भी
अपने अभिमान पर पहरा रख सको।
अगर तुम प्रतीक्षा कर सको
बिना शिकायत के,
और प्रेम कर सको
बिना स्वामित्व के,
और विदा कर सको
बिना कटुता के।
अगर तुम यह स्वीकार कर सको
कि हर सत्य तुम्हारे पक्ष में नहीं होगा,
और हर असहमति तुम्हारा अपमान नहीं होती।
अगर तुम अपने सपनों को इतना बड़ा रखो
कि वे तुम्हें दिशा दें,
पर इतना बड़ा नहीं
कि वे तुम्हें मनुष्य होना भुला दें।
अगर तुम टूटे हुए विश्वास के बाद भी
विश्वास करना सीख सको,
और अपमान के बाद भी
अपनी कोमलता बचाए रख सको।
अगर तुम यह समझ सको
कि कुछ लोग तुम्हें कभी नहीं समझेंगे,
और फिर भी तुम्हारे भीतर
उनके लिए घृणा जन्म न ले।
अगर तुम उस दिन भी
किसी और के लिए प्रकाश बचाकर रखो,
जिस दिन तुम्हारे भीतर स्वयं अँधेरा हो,
तो समझना—
तुम सफल नहीं,
उससे कहीं अधिक दुर्लभ चीज़ बन रहे हो।
तुम मनुष्य बन रहे हो।
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कुछ बातों की बात ही कुछ और है
पुरानी किताबों में रखे हुए
सूखे फूल की बात ही कुछ और है,
वर्षों बाद मिले किसी पत्र पर
ठहरे हुए अक्षरों की बात ही कुछ और है।
कभी देखना
साँझ उतरते समय किसी नदी को,
लगेगा जैसे
दिन भर का शोर छोड़कर
जल भी ध्यान में बैठ गया हो।
जाने कितने मौसमों की थकान लिए
चलती रहती है एक पगडंडी,
कभी गाँव की ओर,
कभी स्मृतियों की ओर,
और कभी स्वयं मनुष्य के भीतर।
कुछ चेहरे भी ऐसे होते हैं,
न बहुत सुंदर,
न बहुत असाधारण,
फिर भी बरसों बाद
याद सबसे पहले वही आते हैं।
सच ही तो है,
कुछ नदियाँ,
कुछ रास्ते,
कुछ पेड़,
कुछ चुप्पियाँ,
कुछ लोग,
अपने होने से अधिक
अपने रह जाने के कारण प्रिय लगते हैं।
और शायद...
प्रेम भी वही नहीं होता
जो सबसे अधिक कहा जाए,
प्रेम तो वह होता है
जो वर्षों बाद भी
मन के किसी कोने में
वैसा ही ताज़ा मिले
जैसे पहली बार मिला था।
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दुनिया में सबसे सस्ती चीज़ सलाह है,
और सबसे महँगी चीज़ वह गलती,
जिसे करने के बाद सलाह समझ आती है।
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