688
जय श्री कृष्ण 🚩
Śrī Rāma, together with his younger brother and in his physical form, entered his own Vaiṣṇava divine effulgence. Then the gods, the Sādhyas and the Maruts, along with Indra and led by Agni, worshipped that deity who had entered the tejas.
— Vālmīki Rāmāyaṇa (7.110.10-11)
भगवान् श्री राम के पितामह और महाराज दशरथ के पिता महाराज अज
Читать полностью…
बृहस्पतिर्मन्त्रविद्धि जजाप च जुहाव च।
एवं स्कन्दस्य महिषीं देवसेनां विदुर्जनाः ॥
षष्ठयां ब्राह्मणाः प्राद्दुर्लक्ष्मीमाशां सुखप्रदाम् ।
सिनीवालीं कुहूं चैव सद्वृत्तिमपराजिताम् ॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
१/२
दूसरे की पत्नी के मुख, नितम्ब तथा स्तनों को कामभाव से देखने पर चार युगों तक नरक में रहना पड़ता है।
Ogling or staring at face, hips or breasts of another’s wife results in a man being condemned to hell for four yuga-s.
ऐसे बना जाता है विश्वगुरु-
चीन हर साल १० हजार मेधावी विद्यार्थियों को विद्यालयों से चुनकर ओलंपियाड आदि अंतरराष्ट्रीय गणित-विज्ञान प्रतियोगिताओं की तैयारी करवाता है । ये भविष्य के टेक लीडर बनते हैं।
आज के भारत में अपनी मेधा को हतोत्साहित कर कुंठित करने का अभियान चल रहा है ।
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू॥
मातृत्व का सर्वोच्च आदर्श माता कौशल्या-
१/२
@Lokesh_Sarswat अब तो सैलरी देंगे मुझे?
Читать полностью…
करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥
जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई॥
हाथों में बाण और धनुष बहुत ही शोभा देते हैं। रूप देखते ही चराचर (जड़-चेतन) मोहित हो जाते हैं। वे सब भाई जिन गलियों में खेलते (हुए निकलते) हैं, उन गलियों के सभी स्त्री-पुरुष उनको देखकर स्नेह से शिथिल हो जाते हैं अथवा ठिठककर रह जाते हैं।
नारायण ! हे रघुनन्दन, यह जगत दृश्य है और आप द्रष्टा हैं । आप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के नियामक हैं । जब ये त्रिदेव आपका मर्म नहीं जानते तो और कोई क्या जानेगा !
Читать полностью…
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥
जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥
जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता है; और जिसके जान लेने पर जगत् का उसी तरह लोप हो जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम जाता रहता है।
Today (on Magha Purnima) is the Jayanti of one of the greatest masters of the Sanskrit language, Mahakavi Magha (महाकविः माघः), the genius behind the Mahakavya Shishupala Vadham (शिशुपालवधम्).
उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवं ।
दण्डिनः पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणः ॥
The similes of Kalidasa (कालिदासः), the depth of meaning of Bharavi (भारविः), and the wordplay of Dandin (दण्डिनः / दण्डी) - In Magha (माघः) all three qualities are found.
एक बार अयोध्या जाओ, दो बार द्वारिका,
तीन बार जाके त्रिवेणी में नहाओगे।
चार बार चित्रकूट, नौ बार नासिक,
बार-बार जाके बद्रिनाथ घूम आओगे॥
कोटि बार काशी, केदारनाथ रामेश्वर,
गया-जगन्नाथ, चाहे जहाँ जाओगे।
होंगे प्रत्यक्ष जहाँ दर्शन श्याम-श्यामा के,
वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे॥
!!~!! जय-जय श्री राधे !!~!!
ममेव पौरुषं रूपं गोपिकाजनमोहनम् ।
(ललितोपाख्यान)
Maa Gauri’s depiction in Bengali lithographic painting. Did you see anything different?
Читать полностью…
राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥Читать полностью…
नामु त भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥
जगत में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्री राम जी के कार्य के लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान जी पर्वत के आकार के (अत्यंत विशालकाय) हो गए॥
२/२
ज्ञान से नहीं, बालक भाव से भगवान् जल्दी प्रसन्न होते हैं। भगवान् वस्तु नहीं, भावना देखते हैं।
Читать полностью…
भगवान् किसी भाषा के बंधन में नहीं, अपने हृदय से उनकी स्तुति करो।
Читать полностью…
हे गोसाईं! सब देव और पितर तुम्हारी वैसी ही रक्षा करें, जैसे पलकें आँखों की रक्षा करती हैं। तुम्हारे वनवास की अवधि (चौदह वर्ष) जल है, प्रियजन और कुटुम्बी मछली हैं। तुम दया की खान और धर्म की धुरी को धारण करने वाले हो॥ऐसा विचारकर वही उपाय करना, जिसमें सबके जीते जी तुम आ मिलो
२/२
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥
🙏🌻 शुभ प्रभात वंदन 💐
श्रीमन्नारायाण हरि विष्णु भगवान् के नाम से जीवन पवित्र हो 🌺
जाओ पुत्र गणेश समस्त संसार के मनुष्यों के कार्य सिद्ध करो — माँ पार्वती
Читать полностью…
भगवद्धाम के निवासी स्वयं पुरुषोत्तम आनन्दकन्द श्रीकृष्ण हैं। वे पूर्ण आनन्दघन स्वरूप हैं।
Читать полностью…
फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा॥
कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥
माया की प्रेरणा से काल, कर्म, स्वभाव और गुण से घिरा हुआ मनुष्य सदा भटकता रहता है। बिना ही कारण स्नेह करने वाले ईश्वर कभी विरले ही दया करके इसे मनुष्य का शरीर देते हैं॥
महामाया भगवती पराम्बा श्री विद्या ललिता,राजराजेश्वरी,षोडशी, कामाक्षी,त्रिपुर सुंदरी 🌺🚩
Читать полностью…
अप्राप्त वस्तु के लिए जाना पड़ता है, पर नित्यप्राप्त परमात्मा श्री कृष्ण को केवल पहचानना होता है।
Читать полностью…